ईमानदारी की कीमत 'तबादला': जालंधर के ACP कैलाश चंद्र की जुबानी, फर्ज और चुनौतियों की अनकही दास्तां

 जालंधर (विनोद बिंटा): "खाकी वर्दी पहनना आसान है, लेकिन उस पर लगे ईमानदारी के दाग को बचाए रखना सबसे कठिन काम है।" यह शब्द किसी फिल्म के डायलॉग नहीं, बल्कि जालंधर में तैनात रहे एसीपी (ACP) कैलाश चंद्र के हैं। एक विशेष मुलाकात के दौरान उन्होंने पुलिस सेवा के उस स्याह सच से पर्दा उठाया, जिसे अक्सर सिस्टम की फाइलों में दबा दिया जाता है।

## ईमानदारी का इनाम: 'तबादला' मुलाकात के दौरान जब उनसे ड्यूटी और ईमानदारी पर सवाल हुआ, तो उनके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि एक पुलिस अधिकारी के लिए ईमानदारी का रास्ता कांटों भरा होता है। उन्होंने बताया कि जब कोई अधिकारी बिना किसी दबाव के, निष्पक्ष होकर अपना काम करता है, तो उसे अक्सर 'इनाम' के तौर पर तबादले का आदेश थमा दिया जाता है। कैलाश चंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके शब्दों में एक गहरी सच्चाई थी, क्योंकि वे उस सिस्टम का हिस्सा रहे हैं जहाँ सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है।


 वो दीपावली का दिन: जब भ्रष्टाचार को दफ्तर से बाहर रखा  बातों-बातों में वह किस्सा भी सामने आया जो आज के दौर के अधिकारियों के लिए एक मिसाल है। यह वाकया दीपावली का है, जब एसीपी कैलाश चंद्र वेस्ट हलके में तैनात थे। आमतौर पर दीपावली के दिन पुलिस दफ्तरों में 'उपहारों' और 'डालियों' का तांता लगा रहता है। रसूखदार लोग अपनी फाइलें सीधी करने या संबंध बनाने के लिए कीमती तोहफे लेकर पहुंचते हैं।लेकिन कैलाश चंद्र ने जो किया, वह विरले ही करते हैं। उन्होंने उस दिन अपने दफ्तर को अलविदा कह दिया और जल्दी घर चले गए। जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा, "अगर मैं दफ्तर में बैठा रहा, तो तोहफे देने वालों की लाइन लग जाएगी। मैं नहीं चाहता कि मेरी कुर्सी पर बैठकर कोई मुझे उपकृत करे।" उन्होंने भ्रष्टाचार के उस रास्ते को ही बंद कर दिया, जहाँ से प्रलोभन आ सकता था।

 चुनौतियां और समझौता विहीन कर्तव्य

एसीपी कैलाश चंद्र ने स्वीकार किया कि ईमानदारी से ड्यूटी करने के दौरान न जाने कितने मानसिक और सामाजिक दबाव सहने पड़ते हैं। प्रभावशाली लोगों की नाराजगी और विभाग के भीतर का खिंचाव एक ईमानदार अफसर को अकेला कर देता है। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अंतरात्मा की शांति उन तमाम सुख-सुविधाओं से बड़ी है जो बेईमानी से हासिल की जाती हैं।

 एक चश्मदीद की गवाही

इस मुलाक़ात के दौरान लेखक (विनोद बिंटा) ने भी उस दौर को याद किया जब उनकी ड्यूटी एसीपी साहब के साथ थी। उस समय की कार्यप्रणाली और उनके फैसलों को करीब से देखने के बाद यह दावा किया जा सकता है कि कैलाश चंद्र की बातों में रत्ती भर भी दिखावा नहीं था। उन्होंने न केवल ईमानदारी की बातें कीं, बल्कि उसे जीकर भी दिखाया।

निष्कर्ष: आज के समय में जहाँ भ्रष्टाचार की खबरें सुर्खियां बनती हैं, वहां एसीपी कैलाश चंद्र जैसे अधिकारी यह उम्मीद जगाते हैं कि सिस्टम में अभी भी 'ईमानदारी' जिंदा है। भले ही ऐसे अधिकारियों को बार-बार तबादलों का सामना करना पड़े, लेकिन जनता की नजरों में उनका सम्मान किसी भी पदोन्नति से कहीं ज्यादा बड़ा है।

दूसरे पार्ट में उनके साथ जो बातचीत हुई आपके सामने लाएंगे

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